गुरुवार, 5 मई 2011

आँच पर खण्डित विश्वास

clip_image001 सारा जीवन जिया दर्द में पीड़ा बैठ गई तनमन में ! जितना प्यार दे रहीं मुझको कैसे खुशियाँ सह पाऊँगा ! अब तो जैसे वर्षों से ना , युग युग से नाता पीड़ा का ! गहरा रिश्ता है अब दुःख से, इसके बिन अब जीना क्या अटूट रिश्ता है चोटों से , जख्मों को सहलाना क्या गहरे घाव ह्रदय में लेकर , खिल खिल कर हँस पाना क्या मैं क्या जानू जख्मीं होकर, घाव भरे भी जाते हैं ! छेड़ छाड़ मीठी झिड़की , आलिंगन का सुख होता क्या ! कैसे झेलूँ प्यार तुम्हारा टूटा मन शीशे जैसा ! हर मीठी नज़रों के पीछे प्यार छिपा ! शंकित मन है ! खंड - खंड विश्वास हुआ है, मोहपाश मैं बंधना क्या ! मेरे एकाकी जीवन को , मधुर हास से लेना क्या ! बहुत मनाऊँ अपने मन को पर विश्वास कहाँ से लाऊं ! तेरी बाँहों का सम्मोहन क्यों बेमानी लगता है ! लगता मेरा बिखरा मन अब कभी नहीं जुड़ पायेगा कैसे समझाऊँ मैं तुमको, पीड़ा का सुख होता क्या !

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हरीश प्रकाश गुप्त

My Photoसतीश सक्सेना जी वैसे तो पेशे से इंजीनियर हैं, लेकिन जिस अधिकार के साथ उनकी कलम गीत लेखन पर चल रही है उससे लगता है कि नियम और सिद्धान्तों के अनुरूप यांत्रिक कार्यकलापों में रमने के बावजूद उनके भीतर एक संवेदनशील और समर्थ कवि वास करता है। उनके गीत उनके अपने ब्लाग “मेरे गीत” पर नियमित रूप से प्रकाशित होते रहते हैं। उनके गीतों में गेयता है, शब्द योजना सरस और प्रखर है, जिससे उनके गीत साधारण शब्दों के प्रयोग के बावजूद आकर्षक बन जाते हैं। सबसे प्रमुख बात यह है कि उनके गीत ऊपरी तौर पर व्यक्तिनिष्ठ प्रतीति कराते हैं लेकिन वह बहुत सहजता से जनसामान्य को जोड़ते हुए उनकी अपनी अभिव्यक्ति बन जाते हैं।

विगत माह के अंतिम सप्ताह में सतीश सक्सेना के ब्लाग “मेरे गीत” पर “खण्डित विश्वास” शीर्षक से एक गीत प्रकाशित हुआ था। इस गीत में पीड़ा एवं वेदना की अभिव्यक्ति की गई है जिसके भोक्ता को जीवन में सुखद सौभाग्य का कभी स्पर्श भी नहीं मिला है। यह गीत पाठक का ध्यान बरबस अपनी ओर खींचता है और सीधे हृदय में प्रवेश करता है। गीत का आकर्षण इसका भाव प्रधान होना भी है। आधुनिक समय में बुद्धितत्व की प्रधानता वाली नई कविताओं के बीच उनका यह गीत कोमल अहसास की तरह है। इसीलिए विचार किया कि इस भाव प्रधान गीत को आज की आँच का प्रतिपाद्य बनाया जाए।

प्रायः हम सभी अपने इर्द-गिर्द विश्वास का एक तिलिस्म रचकर जीवन जीते हैं। अधिकतर, सामने वाले का व्यवहार इस विश्वास का आधार होता है तथा हमारी सीमाएं और हमारे आग्रह इन्हें प्रभावित करने वाले घटक। जीवन की वास्तविकताओं के उतार-चढ़ाव इस विश्वास की कसौटी होते हैं, इसकी परख करते हैं। जब-जब इस विश्वास को आघात पहुंचता है तो उसकी टीस बहुत गहरे तक महसूस होती है। जिससे अधिक अनुरक्ति होती है उससे मिला आघात भी अधिक गहरा होता है। बार-बार टूटता यह विश्वास एक समय इस कदर अविश्वसनीय बन जाता है कि वह इनमें अंतर नहीं कर पाता और इसी अविश्वास को ही विश्वास समझ बैठता है। फिर इसे कितने भी प्रयासों से, आसक्ति से, जोड़ने का प्रयास किया जाए, यह गहरा विश्वास, सामान्यतया हम इसके लिए अटूट विश्वास प्रयोग करते हैं लेकिन यह टूटता भी है इसलिए गहरा विश्वास कहना अधिक उपयुक्त है, टूटा ही रहता है अथवा टूटा-सा रहता है। जैसे शीशा एक बार टूटने के पश्चात फिर पहले जैसा कभी नहीं जुड़ पाता, उसमें एक विभाजक रेखा सदा बनी ही रहती है। जितना दृढ़ विश्वास, उस पर ठेस उतनी ही गहरी और अमिट। उससे जो विरक्ति उपजती है वह यथार्थ की गहन अनुभूति से जनित होती है। उसे सतही प्रयासों से सामान्य नहीं बनाया जा सकता। परिणामस्वरूप एक बार चूर-चूर हो चुका विश्वास हर प्रयास पर सशंकित हो उठता है।

जिस व्यक्ति ने अपना सम्पूर्ण जीवन ही संघर्षों और कठिनाइयों में गुजार दिया हो पीड़ा उसकी जीवनचर्या बन जाती है। वह उन्हें ही अपनी नियति मान लेता है। वही उसका जीवन दर्शन बन जाता है और वह उसे अनन्य रूप में देखता है। उसके लिए प्रचलित सुख का कोई महत्व नहीं होता और खुशियाँ बेमानी लगती हैं। जीवन ने कष्ट और पीड़ा को इस कदर स्वीकार कर लिया होता है कि प्रेम, परिहास, नायिका का सामीप्य और आलिंगन का सुख भी कोई अर्थ नहीं रखते। उसका जीवन पीड़ाओं से इतना सम्पृक्त होता है कि वह इनके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं कर पाता। इसीलिए वह इनके उपचार के प्रति भी उत्साह नहीं रखता और उससे अनभिज्ञ बना रहता है मैं क्या जानूँ जख्मी होकर, घाव हरे भी जाते हैं’।

गीत के शिल्प पर दृष्टिपात करें तो पाते हैं कि कवि की सजग दृष्टि इस गीत पर आद्योपांत रही है। यदि एक स्थान पर प्रवाह में अवरोध – अटूट रिश्ता है चोटों से – को छोड़ दें तो गीत में प्राजंलता पूर्णरूपेण दर्शनीय है। हालाकि मात्राओं की कसौटी पर यह गीत पूर्णतया सफल नहीं कहा जा सकता क्योंकि गीत के चारो पदों में मात्राओं में एकरूपता नहीं है। प्रत्येक पद में एक अथवा अधिकतम दो पंक्तियों में एकाधिक मात्राओं की कमी अथवा अधिकता है। इस कमी को दूर करने पर गीत के सौन्दर्य में निखार आ सकता है। अटूट रिश्ता है चोटों से में निश्चय ही प्रवाह में रुकावट आती है। शायद इससे कवि स्वयं भी सहमत होंगे। तीसरे पद की पंक्ति कैसे झेलूँ प्यार तुम्हारा में “झेलूँ” शब्द गीत की गरिमा के अनुरूप नहीं लगता। हालाकि “झेलूँ” शब्द बोझ स्वरूप स्वीकार्यता का परिचायक है लेकिन गीत के गौरव की दृष्टि से इसी अर्थ में “सह लूँ” अथवा अन्यथा “वर लूँ” आदि शब्दावली का प्रयोग किया जा सकता था। पहले पद की पंक्ति अब तो जैसे वर्षों से ना, युग युग से नाता पीड़ा का प्रथम दृष्टया भ्रम सा उत्पन्न करती है तथापि निहितार्थ प्रकट है।

गीत में कुछ प्रयोग बहुत ही आकर्षक बन गए हैं, जैसे – खंड खंड विश्वास हुआ है, मोहपाश में बंधना क्या। मेरे एकाकी जीवन को, मधुर हास से लेना क्या आवर्ती आघातों से टुकडे़-टुकड़े हो चुका विश्वास अविश्वास में इस प्रकार परिणत हो चुका होता है कि जिससे हम सबसे अधिक लगाव रखते हैं, वह भी इसे बदल नहीं सकता, आसक्ति के बंधन में भी उसे आशा की किरण नहीं दिखती। उक्त पंक्तियों में इन भावों को अत्यंत संश्लिष्ट रूप में व्यक्त किया गया है। गीत के भाव अति सम्प्रेषणीय हैं। वेदना की संवेदनशील अभिव्यक्ति गीत का सौन्दर्य है और लयबद्धता इसकी आभा।

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33 टिप्‍पणियां:

  1. saxena ji ke bare main ekdam sach likha hai....


    jai baba banaras...........

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  2. सतीश जी बहुत अच्छे रचनाकार हैं....

    उनके गीत की आपकी 'आँच ' पर समीक्षा बहुत ही बढ़िया लगी |

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  3. सतीश जी की कविता हृदय तक प्रभाव डालती है।

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  4. सतीश जी के गीत गुनगुनाने को बाध्य कर देते हैं.आज आपकी समीक्षा से उसके नए आयाम जाने.
    बढ़िया गीत की उत्तम समीक्षा.

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  5. अच्छी समीक्षा.

    दुनाली पर स्वागत है-
    ‌‌‌ना चाहकर भी

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  6. सतीश जी की कविता मन को छूती है और उतनी ही शानदार समीक्षा की है।

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  7. सतीश जी की कविता दिल की अवाज होती है |

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  8. हम सतीश जी के पुराने फैन हैं आज से आपके भी हो गए...बहुत कमाल मीमांसा की है आपने...साधुवाद.
    नीरज

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  9. सक्सेना जी की गीत की अच्छी समीक्षा की गयी है। समीक्षक ने गीत के हर पहलू पर सम्यक विचार किया है। साधुवाद।

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  10. बहुत कमाल की मीमांसा की है|धन्यवाद|

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  11. बहुत सुंदर समीक्षा..... सतीशजी की रचनाएँ बहुत प्रभावित करती हैं....

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  12. सतीश जी की रचनाएँ दिल को छू जाती हैं..बहुत सुन्दर समीक्षा..

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  13. Satish ji bahut oonche darje ke kavee hain,isme koyee do raay nahee!

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  14. सतीश सक्सेना जी, वास्तव में एक अत्यंत भावुक और सवेदनशील व्यक्ति हैं. मूलतः कवि कम गीतकार अधिक हैं. अब तक जितनी रचनाएँ मैंने पढ़ी हैं, सब की सब गीत की श्रेणी में आती हैं और उनके ब्लॉग का नाम भी मेरे गीत है जो इस बात की पुष्टि करता है. इस प्रकार यह कहना कि इनकी कविता गेय है, अनावश्यक है.
    दूसरी महाय्वापूर्ण बात इनके गीतों के सन्दर्भ में यह है कि इनकी एक विशेष शब्दावलि है. या ऐसा कहें कि सक्सेना जी का एक अलग शब्दकोष है,जिसके मोती उनके हर गीत में सजे दिखाई देते हैं. यदि शब्दों के चयन में सामंजस्य स्थापित करना चाहें तो उसका सूत्र उनके ह्रदय तक पहुंचता है, जहां एक अति संवेदनशील ह्रदय स्पंदन कर रहा है.
    हरीश जी ने गीत का भावार्थ बड़े विस्तार और सुंदरता से व्यक्त किया है. साथ ही शिल्पगत कमियों की और उनका संकेत साहित्य का विषय है जिसपर उनका अधिकार है. हरीश जी की समीक्षा के हम सभी कायल है. इतनी संतुलित और समृद्ध समीक्षा अन्यत्र दुर्लभ है.
    पुनश्च: गीतकार की अनुपस्थिति खाल रही है.

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  15. सुन्दर गीत, उत्तम समीक्षा।

    दोनों को साधुवाद

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  16. बहुत सुन्दर समीक्षा!
    सतीश जी के बारे मे जानकर अच्छा लगा!

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  17. कुछ अपरिहार्य कारणों से आज की पोस्ट विलम्ब से लग पाई थी। अस्तु पाठकों को हुई असुविधा के लिए खेद है।

    अपने पाठकों की उत्साहवर्धक प्रतिक्रियाओं के लिए आप सबका हृदय से आभारी हूँ। आपकी टिप्पणियां मुझे अपने कार्य के लिए ऊर्जा प्रदान करती हैं। पुन-आभार सहित,

    हरीश

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  18. सुन्दर कविता की बहुत अच्छी समीक्षा ....

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  19. आंच पर "खंडित विश्वास" की समीक्षा पढ़कर अच्छा लगा ...निस्संदेह इससे प्रोत्साहित हूँगा ! आपका आभार !

    हरीश प्रकाश गुप्त जी शैली और शब्द चित्रण से लगभग मुग्ध हुआ हूँ मैं ..
    वे वाकई प्रभावित करते हैं !
    उनको तथा मनोज भाई को शुभकामनायें !!

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  20. खंडित विश्वास सतीश जी का बहुत महत्वपूर्ण गीत है।

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  21. बेहद खूबसूरत गीत , समीक्षा तो महत्वपूर्ण है ही !

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  22. सतीश सक्सेना-विज्ञापन की भाषा में बोलें तो नाम ही काफ़ी है. इतनी शानदार समीक्षा पढ़ कर मन प्रसन्न हो गया. इंसाफ हो गया गीत के साथ. केवल एक परेशानी है, मेरे कहने को कुछ बचा ही नहीं.

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  23. बढ़िया रही बात। उभय-पक्षों की चर्चा से समृद्ध!!

    सुन्दर !

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  24. sudarshan, vyaktitva avam kalam donon se ,saikadon ish ka bardahast jisako mila ho ,vah kuchh bhi karega achha hi karega .aur shatish ji ne jo kiya ,vah mukharit hai ...../ sarv priy ,swikary s.saxena ji . safalta yon hi kadam chumen .

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  25. शब्दशः सहमत हूँ -बहुत संतुलित समीक्षा !

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  26. अक्षरशः उपयुक्त समीक्षा. सतीश जी से व्यक्तिगत मिला हूँ. लम्बी चर्चायें हुई हैं. अतः समझ सका हूँ कि किस तरह संवेदनशीलता और परपीड़ा का वाहक है उनका कोमल दिल.

    आँच पर इस समीक्षा को देखकर हर्षित हो उठा. सतीश जी के गीत इस तरह कमाल के अंकित होते हैं कि फिर कई दिनों तक उन्हें गुनगुनाने का मन होता है.

    शिकायत इतनी है कि बहुत कम लिखते हैं. :)

    अनेक शुभकामनाएँ.

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  27. आपने सतीश जी का आकलन एकदम सही किया है ।एक अच्छे लेखक और कवि होने के साथ-साथ सतीश जी प्रेरक भी बहुत अच्छे हैं .....सादर !

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  28. सतीश जी की कविताएँ -उनके गीत उत्तम हैं और हरीश जी की समीक्षा भी बढ़िया है |

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