शनिवार, 14 अगस्त 2010

सावन आये सुहावन (शनिवार - फुर्सत में...) … करण समस्तीपुरी

सावन आये सुहावन (शनिवार - फुर्सत में...)


करण समस्तीपुरी

सखी हे सावन आये सुहावन ! वन में बोलन लागे मोर !

अमुआ की डारी कोयलिया कुहके.... जियरा मारे हिलोर !!

सखी हे सावन आये सुहावन ! वन में बोलन लागे मोर !!

आहा.... ! शस्य श्यामला वसुंधरा... ! श्यामल घनाच्छादित अम्बर.... ! दुति दामिनी की अठखेलियाँ.... शीतल मंद समीर... ! द्रवित हुए सदय मेघ राशि.... मुस्काई हरित-वसना धरा ! आह... आसाढ़ के उच्छवास से मिला संत्रास.... ।

बरखा रानी के काले कुंतल से नीर-बिंदु झहरे और बन गए वसुधा का श्रृंगार। निदाघ पड़ी धरती के फटे हृदय को पाट गया वारिद। पृथ्वी की कोख से फूटी हरीतिमा.... सज गयी प्रकृति रानी। खिले हरश्रृंगार, कचनार और पलास के फूल। अम्बर में इन्द्र ने धनुष उठा किया गर्जन। मेघ-मेखला में छुप गए मयंक-अंशुमान। श्रावणी धरा के स्वागत में दादुर, मोर, पपीहा, कोयल, भेख करे कल-गान।

खेतों में उग आये धान। सपने संजोये खाली-खलिहान। भविष्य के प्रति आशावान। बादल-राग पर नाचते किसान.... ! सावन के बिना ये कैसे होता... ? इसीलिये आ गया है सावन। एक-एक बूँद में सम्पन्नता का सन्देश। समरसता का आग्रह.... बराबर बरस रहा है जो नदी पर भी, नाले पर भी। कौन रखेगा पावस का प्रतिहार... ? क्षमता और सहनशीलता की परीक्षा.... ? कौन कितना ग्रहण करता है... कौन कितने में उमर जाता है ?

वृषभराज के स्कंध पर सज गया हल। कृषक-समूह आये घर से निकल। धन-धान्य आयेगा आँगन। आंगना का का खिल गया मन। हाथों में सज गयी मेंहंदी। बागों में पड़ गए झूले। नभ में नीरद का रोर। घिर आयी घटा घन-घोर। रिम-झिम रिम-झिम पयोद। नायिका के मन मोद। किन्तु युगल हृदय का एकल जीव। प्रियतम या तो परदेस या खेत में... ! बुझ गयी धरती की प्यास पर लग गयी बिरहन उर आग। पावस की फुहार में विरही मन करे मनुहार,

"बरसे सावन के रस-झिसी, पिया संग खेलब पचीसी ना... !

पिया संग खेलब पचीसी न.... !

बरसे सावन के रस-झिसी, पिया संग खेलब पचीसी ना !!

मुख में पान, नयन में काजर, दांत में मिसी ना !

बरसे सावन के रस-झिसी, पिया संग खेलब पचीसी ना !!"

परन्तु जिनके प्रियतम परदेस में हैं 'पिया संग पचीसी खेलने' के सपने भी कैसे देखें ? वो तो फागुन से प्रियतम के आगमन की प्रतीक्षा कर रही हैं।

चढ़ते फगुनवा, सगुणवा मनावे गोरी ! चैता करे रे उपवास !!
गर्मी बेशर्मी, ना बेनिया डोलाबे मन, डारे सैय्याँ गरबा में फांस !!

उफ़... ! प्रियतम तो गले में फांस डाल के चले गए हैं। न उन्मुक्त विहार की स्वतंत्रता है ना अभिसार का सुख। धारासार की धुन में प्रकृति हो गयी है संगीतमय। विरहिनियों के अधर पर भी फूट पड़े हैं गीत। परन्तु बोल हैं विरह के।

"दिनवा गिनत मोरी घिसली अंगुरिया, रहिया तकत नैया लोरै रे विदेसिया.... !" हे प्रवासी प्रियतम ! तुम्हारे आने के दिन गिन-गिन के मेरी अंगुलियाँ घिस गयी और राह पर लगी आँखों में सिर्फ आंसू रह गए हैं। अब तो आ जाओ।

आया सावन झूम के। फिर बरखा बहार आयी, रस की फुहार लायी। और संग लायी तीज-त्यौहार। अम्बर में घटा... ! आँगन में उमंग की छटा ! प्रियतम बिना कैसी सम्पन्नता... फिर कैसा त्यौहार ? कैसे गीत ? पाहुने बिना तीज कैसा... ? प्रकृति में उल्लास है। समृद्धि के घर आने की आशा में शुरू हो गयी तीज और त्योहारों की श्रृंखला.... लेकिन विरहिन का मन तो अब भी उद्विग्न है।

"नीक सैय्याँ बिन भवनमा नहीं लागे सखिया ...... !
रिम-झिम बरसे ला सावनमा, बैरी वश में नहीं मनमा... !!
नीक सैय्याँ बिन भवनमा नहीं लागे सखिया ...... !

फूले नहीं समाये धरती, पहिन हरियरी साड़ी रे... !
बालमवाली होयके भी मैं, फिर भी रहूँ कुंवारी रे !!
मन में जले विरह की आगि, छोटे नहीं छुडाये लागी !
नीक सैय्याँ बिन सावनमा नहीं लागे सखिया ...... !

(पूरा गीत सुन-ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिये। )

लेकिन निर्मोही सावन को किसकी परवाह ? वह तो बरसेगा... कोई हरसे या कोई तरसे... ! जिनके प्रियतम पास नहीं हैं उन्होंने लाख समझाया, "बिन सजन तरसे नयन, विरह की लागी अगन !" लाख मनाया, "बिन सजन तड़पे हैं मन, बरसों न मेरे आँगन !!" मगर उन्मत्त सावन किसकी सुनता है ?

बदरा उमरि घुमरि घन गरजे, बुंदिया बरसन लागी ना.... !
बुंदिया बरसन लागी न..... !!

दादुर-मोर-पपीहा गाबय, जिया उमताबे न.... !
हाय हो रामा.... ! जिया उमताबे न.... !!
विरह के आगि कुहुकी कुहुकाबय बैरी कोयलिया ना.... !
बदरा उमरि घुमरि घन गरजे, बुंदिया बरसन लागी ना.... !

पिऊ के पाती लिखल हम कत-विधि, तैय्यो न पिघलथि ना... !
हाय हो रामा... ! तैय्यो न पिघलथि ना..... !!
कंत हमर हियहंत भेल छथि, दरदो न जाने ना.... !
बदरा उमरि घुमरि घन गरजे, बुंदिया बरसन लागी ना.... !

(पूरा गीत सुनने के लिए यहाँ क्लिक कीजिये।)

यह कजरी है। बिहार और उत्तर प्रदेश में सावन में राग मल्हार पर आधारित कजरी गीत बहुत लोकप्रिय है। प्रस्तुत कजरी सरल मैथिली में है, जिसमे विरहिणी सावन में अपनी दुरावस्था का बखान करते हुए कहती है कि वे अपने प्रियतम को अनेक विधि से सन्देश दे कर थक गयीं, परन्तु वो हैं कि पिघलते ही नहीं। उसके कंत ही हियहंत (हृदय को मारने वाला) अर्थात दिलबर ही दिल तोड़ने वाले बन गए हैं, उन्हें पावस में मेरी एकाकी पीड़ा का थोड़ा भी भान नहीं है.... !

42 टिप्‍पणियां:

  1. सावन में साजन के विरह का ताप और बढ जाता है.
    सुन्दर चित्रों और गीत से सजी यह पोस्ट संग्रहणीय है.

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  2. बहुत सुंदर पोस्ट मनोज जी-देशी बघार के साथ
    गीत आराम से फ़ुरसत में सुनते हैं।

    नागपंचमी की बधाई
    सार्थक लेखन के लिए शुभकामनाएं-हिन्दी सेवा करते रहें।


    नौजवानों की शहादत-पिज्जा बर्गर-बेरोजगारी-भ्रष्टाचार और आजादी की वर्षगाँठ

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  3. करन जी! माने ऊ का कहते हैं कि एक्के बार में सराबोर कर दिए, प्रकृति का बर्नन करते करते बिरह का रह में डुबो दिए... ई फैसला करना मोस्किल हो गया कि बरसात का मीठा पानी है कि नैनों का खारा जल... नीक सैंया बिन भुबनवा सुनकर रोम रोम पुलकित हो गया… एतना पुराना बिसराया हुआ संगी(त) भेंटा गया हो जईसे... अऊर साथे में बुंदियाँ बरसन लागी ना! हम त का मालूम कौन दुनिया में बिचरने लगे... एगो बात बोलें आपका पोस्ट पढला के बाद बुझाता है कि आप कलम (की-बोर्ड) से फोटॉग्राफी करते हैं…जो मन का फोटॉ प्लेट पर छप जाता है!

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  4. सच ही फुर्सत में लिखी गयी ...
    अच्छी पोस्ट ..

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  5. sachmuch man hi bhig gaya.

    karan ji, aap bhi kamal ho. khoj khoj kar ek se ek badhiya chije late ho. bhasha ne man moh liya. bahut sundar post.

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  6. आपकी रचना शब्दों द्वारा सावन के खुबसूरत चित्रण को पेश करती है .. सजनी की विरह अपने पिया के प्यार के खातिर भी बहुत खुबसूरत ढंग से बयान की गई है...

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  7. @ एम वर्मा जी,
    धन्यवाद ! आपने प्रस्तुति की आत्मा को महसूस किया !!

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  8. @ ललित शर्मा जी,

    हाँ जी ! फुर्सत का इस्तेमाल तो हम ऐसे ही करते हैं. आप ने सराहा, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद !!

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  9. @ चला बिहारी........
    पता नहीं लेकिन हम जो सोच-सोच कर लिखते हैं, आप पढ़ कर एक्साक्ट्ली वही कैसे समझ जाते हैं ? हमको लगता है बहुत तगड़ा फ्रिक्वेंसी मैच है. बस आपका आसिरबाद बना रहे तो हम ऐसे ही की-बोर्ड टिपटिपाते रहेंगे. मगर चचा, पोस्ट में दू गो और गीत का लिंक है. लगता है आप मिस कर गए. चढ़ते फगुनवा, सगुणवा मनावे गोरी !...... और "दिनवा गिनत मोरी घिसली अंगुरिया,.............. ! उम्मीद है, ये भी आपको पसंद आयेंगी !!

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  10. @ वाणी-गीत,

    हाँ जी ! फुर्सते में लिखे हैं. मगर लगता है कि आप बहुत जल्दी में टिपिया गए हैं ! कम से कम धनयवाद तो लेते जाइए.... !

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  11. @ हरीश प्रकाश गुप्तजी,

    हौ महराज ! छतरी लाना भूल गए थे का.... खैर भीग गए तो ठीक है.... घर जा कर कपड़ा जरूर बदल लीजियेगा.... मगर हमरे प्रति अपना सिनेह ऐसे ही रहने दीजियेगा !! धन्यवाद !!!

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  12. @ निशांत,

    निशांत भाई, दिल आपका है.... खुश हो गया तो हम क्या कर सकते हैं ! चलिए ख़ुशी हमें भी हुई.... आपके आने से और दिल खुश कर के जाने से !!!

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  13. @ डॉली वर्मा जी,
    डॉली जी, देखे आपको बुला लिए न.... ! अभी तो फेसबुक पर ही लिखे हैं.... अब हमारे पोस्ट पर नहीं आयेंगी न तो फ़ोन कर के बुलायेंगे... ! समझी.... ! तो चलिए अब आपको धन्यवाद भी बोल देते हैं !!

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  14. बहुत सुन्दर शब्दों का ताना -बाना ....गीत और आपका किया वर्णन बहुत सुन्दर है ...

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  15. बहुत संदर पोस्ट। गीतों का सुंदर चयन।
    इस विधा से परिचय कराने के लिए आभार!

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  16. बहुत अच्छा लगा यह पोस्ट.बढिया ,मजा आ गया.

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  17. @ संगीता स्वरुप,
    आपकी टिपण्णी की प्रतीक्षा भोर से ही थी.... आपको अच्छा लगा... श्रम सार्थक जान पड़ता है !!!

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  18. @ मनोज कुमार,
    यह तो मुझे पता भी नहीं कि यह भी कोई विधा है... वो भी नयी ! मैं तो बस फुर्सत में लिख रहा था.... !!!

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  19. आपकी हिंदी को लाखों सलाम.... बहुत अच्छी लगी यह पोस्ट...

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  20. @ महफूज अली,
    बहुत-बहुत शुक्रिया, महफूज भाई !

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  21. थोड़ा भीग लिए हम भी इस बारिश और विरह में।

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  22. @ Kumar Radha-Raman,

    Thoda hee kyun ? Jab bheege hee to achchhe se bheegte... yahaan nahi koi entry fees hai na hee usage charge... ! khair chaliye, dhanyawaad to lete jaaiye.

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  23. Hum to pahle se hi Apake dwara likhe gaye Post ka das hun, Lekin ye post dil me kil chubha raha hai.

    Dhany hun mai, Mujhe aapka post padhne ko milta hai.

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  24. Kya bat hai Karan Ji..Apke post ne to sawan ko sach me suhanwna bana diya...kya likha hai ekdum dil ke aarpar ho gaya...
    Ek ke bad ek jabardast prastuti ke liye bahoooooooooot bahoooooooooooooot dhanyawad...

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  25. सावन के हर रंग को भर दिया है ……………पिय मिलन और विरह को बेहद खूबसूरती से संजोया है।

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  26. बहुत खूबसूरत ढंगसे लिखा है आपने और प्रस्तुती कारण तो लाजवाब

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  27. करण भाई , आपकी यह प्रस्तुति बहुत अच्छी लगी .
    आभार......

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  28. इसे कहते हैं ------बढिया,खूबसूरत,और मनमोहक प्रस्तुती----पढने ,सुनने ,देखने -----की तीनों विधाओं का भरपूर प्रयोग.......सहेजने योग्य--
    एक यादगार पोस्ट

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  29. सुंदर शब्दों का समायोजन हैं ...लेकिन बारिश भी बहुत तेज है. फिर भी शब्द रुके रहे हैं अपनी सुंदरता लिए.

    सुंदर चित्र.

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  30. आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई।

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  31. करण जी पहली बार आपकी कोई रचना पढ़ रहा हूँ और आपकी सम्प्रेषण क्षमता का कायल हो गया.. सावन तो वैसे ही लुभाता है.. आपने वो दिन याद दिला दी जब कमला बालन के तट पर खड़े हो हम पानी को चदते उतारते देखते थे और पास से धनरोपनी को जाती महिलायें ये सब गीत गया करती थे... शीतल हवा... दूर दूर तक फैले कहत.. नए नए धान से पते सुग्पंक्षी कहत... पतले पतले मेढ़... और दूर से आते गीतों का स्वर... बहुत बढ़िया संयोजन किया है आपने.. बहुत सुंदर... खोजपरक.. लोक गीतों को बचने के लिए आप सार्थक कुछ कर सकते हैं... और जरुर कीजिये... शुभकामना सहित

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  32. Karan Ji..apke is post ko padhne ke bad me inna he kahungi ki ap saniwar he kyun ap har din fursat me rahe aur aise he dhamkedar post likha kare...Waise to apke blog par bahot kam aane ko mauka milta hai aj inne dino bad aai aur ye post padhkar bahoooooooooooooooooot he acha laga..
    Sach me apki lekhaki me DUM hai..

    Dhanyawad...

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  33. HUM TO APKE IS POST KO PADHKAR ITNA HE KAHENGE...

    KYA BAT..KYA BAT...KYA BAT...

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  34. तरसे या हरसे हृदय, मास गर्व में चूर |
    कंत हुवे हिय-हंत खुद, सावन चंट सुरूर |
    सावन चंट सुरूर, सुने न रविकर कहना |
    राखी में मगरूर, पिया की जालिम बहना |
    लेती इन्हें बुलाय, वहाँ पर खुशियाँ बरसे |
    मन मेरा अकुलाय, मिलन को बेहद तरसे ||

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  35. बहुत बढ़िया है .पूरी रचना में एक सांगीतिक बयार है मीठी भाषा की आंचलिक बोली और सांगीतिक बंदिशों की ...पर देश में सूखे के आसार हैं .

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  36. प्रियतम बिना कैसी सम्पन्नता.... ? पावन परिरम्भन से परिमग्न पोस्ट... अति सुन्दर ! साधुवाद !

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